कैसरिया के बेसिल ने अस्पताल की स्थापना की
जब मसीही मंडळी यूनानी-रोम साम्राज्य का भाग बनने लगी, तब परमेश्वर ने उसके सामाजिक ढांचे को बदलना आरंभ किया। कैसरिया के बेसिल (सन् 330–379) इस परिवर्तन के अग्रणी थे।
बेसिल, जो दस बच्चों में से एक थे, आधुनिक तुर्की में स्थित कप्पदोकिया में एक समृद्ध मसीही परिवार में पले-बढ़े। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की और विधि तथा भाषण कला (rhetoric) में शिक्षा देना और अभ्यास करना शुरू किया, परंतु उनके जीवन की दिशा अचानक बदल गई। उन्होंने कहा,
"मैंने मूर्खताओं में बहुत समय नष्ट किया, और अपनी जवानी के लगभग सारे वर्ष व्यर्थ के प्रयासों और उस बुद्धि को सीखने में लगा दिए, जिसे परमेश्वर ने मूर्ख ठहराया है। फिर एकाएक, जैसे किसी गहरी नींद से जागा, वैसे ही मैं उठा और सुसमाचार की अद्भुत ज्योति को देखा, और इस संसार के शासकों की सारी बुद्धि की व्यर्थता को पहचाना।”
बेसिल एक प्रमुख प्रारंभिक धर्मशास्त्री और विश्वास के रक्षक बन गए। वह एक सामूहिक सन्यास जीवन की ओर अग्रसर हुए — जो तपस्या या एकांत जीवन न होकर भक्ति और परोपकार से युक्त था। वे अंततः कैसरिया के बिशप बने।
बेसिल ने यीशु मसीह की शिक्षाओं से प्रेरित होकर निर्धनों और पीड़ितों की सेवा की। उन्होंने कैसरिया के बाहर एक 300 बिस्तरों वाला बड़ा केंद्र (Basiliad) स्थापित किया, जो बीमार और घायल लोगों के लिए था। यह संसार का पहला अस्पताल माना जाता है। वहाँ मरीजों की देखभाल की जाती थी — डॉक्टर और नर्सें उनका इलाज करती थीं, और बीमारियों पर अध्ययन भी किया जाता था।
"हेक्टोएन इंटरनेशनल: ए जर्नल ऑफ मेडिकल ह्यूमैनिटीज" के अनुसार, एक संस्था को वास्तविक "अस्पताल" कहलाने के लिए तीन बातें आवश्यक होती हैं — (1) रोगियों के रहने की सुविधा, (2) प्रशिक्षित चिकित्सक व देखभालकर्ता, और (3) निःशुल्क चिकित्सा सेवा। बेसिल का बासिलियाड इतिहास में पहला संस्थान था जिसमें ये तीनों तत्व मौजूद थे।
बेसिल के मित्र और सह-धर्मशास्त्री बिशप ग्रेगोरी नाज़ियानज़ेन ने बासिलियाड को विश्व के सात अजूबों से भी महान बताया। उन्होंने कहा, “दूसरों के पास स्वादिष्ट भोजन, रसोइये, सजीले वस्त्र, भव्य गाड़ियाँ और आरामदायक जीवन होता है; परंतु बेसिल की चिंता बीमारों की देखभाल, उनके घावों को भरने, और मसीह की नकल करने में थी — जैसे उन्होंने कोढ़ियों को शब्द से नहीं, बल्कि कर्म से शुद्ध किया।”
यूनानियों ने चिकित्सा विज्ञान को विकसित किया था, और बेसिल ने इस ज्ञान का सदुपयोग किया। कुछ मसीही यूनानी चिकित्सा को अपनाने से झिझकते थे क्योंकि वह उनके धार्मिक पंथों से जुड़ी होती थी और वह मसीह की बजाय मानव-समाधानों पर निर्भर होती थी। लेकिन बेसिल ने कहा: "चिकित्सा हमें परमेश्वर द्वारा दी गई है, जो हमारे जीवन को संचालित करता है। जो औषधियाँ किसी बीमारी के लिए विशेष हैं, वे यूँ ही धरती से नहीं उग आतीं; यह सृष्टिकर्ता की इच्छा से ही है कि वे हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करें।”
बेसिल आगे कहते हैं, "चिकित्सा का स्रोत परमेश्वर ही है। जब बुद्धि अनुमति देती है, तब हम चिकित्सक को बुलाते हैं, परंतु परमेश्वर पर आशा रखना कभी नहीं छोड़ते। मेरे विचार में चिकित्सा कला किसी भी प्रकार से छोटी सहायता नहीं है।... मैंने स्वयं यीशु मसीह से सीखा है कि करुणा क्या है, और हमें इसे कैसे व्यवहार में लाना है। क्योंकि उन्होंने कहा, ‘यदि तुम एक दूसरे से प्रेम रखो, तो सब लोग जानेंगे कि तुम मेरे चेले हो।’ इसलिए जब तक मुझमें सच्चा और निष्कपट प्रेम न हो, मैं स्वयं को मसीह का सेवक कहलाने की आशा नहीं कर सकता।”
इतिहासकार फिलिप शैफ लिखते हैं,
“बेसिल निर्धन और प्रायः रोगग्रस्त रहते थे; उनके पास केवल एक घिसा-पिटा वस्त्र था, और वे प्रायः केवल रोटी, नमक और जड़ी-बूटियों पर जीवित रहते थे। उन्होंने निर्धनों और रोगियों की देखभाल का भार अपने ऊपर लिया। उन्होंने कैसरिया के निकट एक भव्य अस्पताल की स्थापना की... उन्होंने स्वयं पीड़ितों को अंदर लिया, उन्हें भाई जैसा व्यवहार दिया, और उनकी भयंकर अवस्था के बावजूद, उन्हें चूमने से भी नहीं हिचकिचाए।”
बेसिल की मृत्यु सन् 379 ई. में हुई। इसके पश्चात रोमन साम्राज्य में हर जगह अस्पताल खुलने लगे। सौ वर्षों के भीतर, अस्पताल पश्चिमी समाज का सामान्य भाग बन गए। चिकित्सा इतिहास के सबसे प्रमुख विद्वान हेनरी सिगरिस्ट ने कहा कि मसीही धर्म ने समाज के बीमारों के प्रति दृष्टिकोण में “सबसे क्रांतिकारी और निर्णायक परिवर्तन” लाया, और बीमार लोगों को समाज में “विशेष स्थान” दिया।
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