रोम का संत क्लेमेंत : संक्षिप्त परिचय

 रोम का संत क्लेमेंत : संक्षिप्त परिचय

c. 1000 portrayal at Saint Sophia's Cathedral, Kyiv

संत क्लेमेंत (Saint Clement of Rome), जिन्हें रोमी क्लेमेंत भी कहा जाता है, प्रारंभिक कलीसिया के प्रमुख नेताओं में से एक थे। वे पहले सदी के अंतिम भाग में जीवित थे और सामान्यतः उन्हें रोम का तीसरा बिशप माना जाता है – संत पतरस और संत लिनुस के बाद। परंपरा के अनुसार, रोम के बिशप (या प्रेसबिटर-बिशप) के रूप में कार्यरत थे।

क्लेमेंत ने लगभग 66 ईस्वी में रोम का बिशप होकर कुरिन्थियों को पत्र लिखा। संभाव्यता यह माना जाता है कि संत पतरस के पश्चात क्लेमेंत रोम का तीसरा बिशप था। उस समय तक बिशप और प्रेसबिटर दो अलग-अलग पद नहीं थे, और क्लेमेंत इन दोनों को समान मानता था। अतः वह रोम की कलीसिया का 'प्रेसबिटर-बिशप' था।

'मिथ्या क्लेमेंत संबंधी साहित्य' के अतिरिक्त, दो 'कुरिन्थियों के नाम पत्रों' की रचना का श्रेय क्लेमेंत को दिया गया है। इनमें से पहला क्लेमेंत (जिसका अनुवाद आगे प्रकाशित है) उसका असली पत्र है, और यही उसकी ख्याति का वास्तविक कारण है। यह पत्र उस समय लिखा गया जब कुरिन्थुस की कलीसिया में कई धर्म-वृद्ध (प्रेसबिटर) पदच्युत किए गए थे और वहाँ तीव्र संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। यह पत्र रोम की कलीसिया की ओर से उस संघर्ष को सुधारने के उद्देश्य से लिखा गया था।

यह पत्र अत्यंत सम्मानित था और लगभग 170 ईस्वी में कुरिन्थुस की कलीसिया की आराधना में धर्मशास्त्र पाठ के साथ पढ़ा जाता था। क्लेमेंत का पर्व दिवस पश्चिमी कलीसिया में 23 नवम्बर को और पूर्वी कलीसिया में 24 या 25 नवम्बर को मनाया जाता है (ऑक्सफॉर्ड कलीसिया ज्ञानकोश)।

इस पत्र की विशेषता यह है कि इसमें पुराने नियम (सप्तति यूनानी अनुवाद) से बहुत से उद्धरण मिलते हैं। इस्राएल के वीर व्यक्ति मसीही चाल-चलन के उदाहरण बन गए हैं। क्लेमेंत, पौलुस के पत्रों से भी परिचित था, विशेषकर कुरिन्थियों का पहला पत्र, जो उसका एक नमूना बन गया। क्लेमेंत ने प्रेम के गीत का अनुकरण किया है (अध्याय 46-50), पुनरुत्थान (अध्याय 25) और फूट (अध्याय 47) के विषय में शिक्षा दी है।

क्लेमेंत के विचारों में नैतिक रुचि विशेष रूप से दिखाई देती है, और उसमें नीतिवाद का प्रभाव भी स्पष्ट है। उसने दीनता और नियम पालन जैसे गुणों पर विशेष बल दिया है। नया नियम में संकलित लेखों को छोड़कर यह पत्र संभवतः प्राचीन कलीसिया का सबसे पुराना लेख है।



कई परंपराओं के अनुसार, संत क्लेमेंत को सम्राट ट्रायन (Trajan) के शासनकाल में ख्रीस्तीय विश्वास के कारण निर्वासित किया गया। उन्हें क्रीमिया (आज का यूक्रेन) क्षेत्र में कठोर श्रम के लिए भेजा गया, जहाँ वे अन्य कैदियों के बीच विश्वास फैलाते रहे। अंततः उन्हें एक लंगर से बाँधकर समुद्र में डुबो कर शहीद कर दिया गया। इस प्रकार, लंगर उनके शहीदी चिह्न के रूप में पहचाना जाता है।

संत क्लेमेंत का पर्व दिवस पश्चिमी कलीसिया में 23 नवम्बर और पूर्वी कलीसिया में 24 या 25 नवम्बर को मनाया जाता है। उनका नाम रोमन कैनन (मिस्सा की प्रार्थना) में भी सम्मिलित है। रोम में बेसिलिका ऑफ सेंट क्लेमेंत (Basilica di San Clemente), उनके सम्मान में स्थापित एक प्रमुख गिरजाघर है, जो उनके नाम और स्मृति को जीवित रखता है।

लेख क्रेडिट: किताब: प्रेरितीय कलीसिया के अगवाई की पत्रियाँ (यह किताब हिंदी में उपलब्ध, मुंबई में ELS से दादर में आप खरीद सकते है)



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