अपोक्रिफा (Apocrypha) ऐतिहासिक संशोधन

अपोक्रिफा (Apocrypha)



उच्चारण: अ-पोक-रि-फा (a-pok'-ri-fa)


विषय-सूची


I. परिभाषा


II. अपोक्रिफा नाम

1. मूल अर्थ

   (1) शास्त्रीय यूनानी भाषा में

   (2) हेलेनिस्टिक यूनानी भाषा में

   (3) नए नियम में

   (4) आरंभिक कलीसियाई लेखकों के लेखों में

2. यूनानी दर्शन आदि में “गूढ़” साहित्य


III. अपोक्रिफा शब्द का प्रयोग

1. आरंभिक मसीही प्रयोग

   “प्रलय-संबंधी” साहित्य

2. पूर्वी कलीसिया

   (1) “गूढ़” साहित्य (क्लेमेण्ट ऑफ अलेक्जेंड्रिया आदि)

   (2) “धार्मिक” पुस्तकों के अर्थ में परिवर्तन (ओरिजन आदि)

   (3) “जाली” पुस्तकें (अथानासियुस, नाइसिफोरस आदि)

   (4) “साठ पुस्तकों की सूची”

3. पश्चिमी कलीसिया

   (1) डिक्रेटम गेलासियाई

   (2) “गैर-प्रामाणिक” पुस्तकें

4. धर्म-सुधारक

   प्रामाणिक पुस्तकों से अलग करना

5. “अपोक्रिफा” के लिए इब्रानी शब्द

   (1) क्या ऐसे शब्द वास्तव में मौजूद हैं?

   (2) जान, श्यूरर, पोर्टर आदि के विचार (गनाज़, गेनुज़ीम)

   (3) अस्वीकार करने के कारण

6. सारांश


IV. अपोक्रिफा की विषय-वस्तु

1. पुस्तकों की सूची

2. पुस्तकों का वर्गीकरण


V. अपोक्रिफा की मूल भाषाएँ


VI. अपोक्रिफा के लेखों की रचना-तिथि


I. परिभाषा


आमतौर पर जिस अर्थ में “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग किया जाता है, उससे तात्पर्य उन धार्मिक लेखों के संग्रह से है जिन्हें सेप्टुआजेंट और वुल्गेट में (कुछ छोटे-मोटे अंतर के साथ) यहूदी और प्रोटेस्टेंट बाइबल के संग्रह में शामिल पुस्तकों के अतिरिक्त पाया जाता है। जैसा कि आगे स्पष्ट किया जाएगा, यह इस शब्द का मूल अथवा सही अर्थ नहीं है; फिर भी आधुनिक भाषा में इसका लगभग विशेष रूप से यही अर्थ प्रचलित है।


वर्तमान समय के आलोचनात्मक और शोधपरक लेखों में इस संग्रह को सामान्यतः “पुराने नियम का अपोक्रिफा” कहा जाता है, क्योंकि कम-से-कम इसकी अनेक पुस्तकें इब्रानी भाषा में लिखी गई थीं, जो पुराने नियम की भाषा है, और क्योंकि ये सभी पुस्तकें नए नियम की अपेक्षा पुराने नियम से अधिक निकटता रखती हैं। लेकिन पुराने नियम के अपोक्रिफा के साथ-साथ “नए नियम का अपोक्रिफा” भी है, जिसमें सुसमाचार, पत्रियाँ आदि शामिल हैं।


इसके अतिरिक्त, आधुनिक समय में “अपोक्रिफल” विशेषण का प्रयोग उन लेखों के लिए भी अक्सर किया जाता है जिन्हें सामान्यतः “छद्म-लेखकत्व वाले लेख” (Pseudepigraphical Writings) कहा जाता है। इन्हें यह नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि इनके शीर्षकों में ऐसे लेखकों के नाम दिए गए हैं जिन्होंने वास्तव में इनकी रचना नहीं की थी और न ही कर सकते थे; उदाहरण के लिए हनोक, अब्राहम, मूसा आदि। इन पुस्तकों से जिन व्यक्तियों के नाम जोड़े गए हैं, वे इस्राएल की परंपराओं और इतिहास के सबसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों में गिने जाते हैं। इसमें संदेह नहीं कि इन नामों का उपयोग करने का उद्देश्य इन लेखों को अधिक महत्व और अधिकारपूर्ण प्रतिष्ठा प्रदान करना था।


हाले के दिवंगत प्रोफेसर ई. काउट्श (E. Kautzsch) ने पुराने और नए नियम के अपोक्रिफा तथा छद्म-लेखकत्व वाले लेखों का जर्मन अनुवाद संपादित किया था। इसमें श्रेष्ठ जर्मन विद्वानों द्वारा लिखी गई उत्कृष्ट भूमिकाएँ और मूल्यवान टिप्पणियाँ शामिल थीं। डॉ. एडगर हेनेके (Edgar Hennecke) ने नए नियम के अपोक्रिफा पर इसी प्रकार का एक अन्य ग्रंथ संपादित किया। विद्वत्ता और उपयोगिता—दोनों दृष्टियों से अंग्रेज़ी भाषा में ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसकी तुलना काउट्श और हेनेके द्वारा संपादित इन ग्रंथों से की जा सके। काउट्श द्वारा संपादित ग्रंथ के समान एक अंग्रेज़ी ग्रंथ भी अब ऑक्सफोर्ड प्रेस से प्रकाशित होने की प्रक्रिया में है। इसके संपादक डॉ. आर. एच. चार्ल्स हैं और इस लेख का लेखक भी उसमें एक योगदानकर्ता है।


II. अपोक्रिफा नाम


आगे की चर्चा से स्पष्ट होगा कि जब कलीसियाई लेखों में “अपोक्रिफल” शब्द का पहली बार प्रयोग हुआ, तब इसका अर्थ लगभग “गूढ़” (Esoteric) के समान था। अर्थात् “अपोक्रिफल लेख” ऐसे लेख थे जो केवल एक विशेष आंतरिक समूह के लिए थे और जिन्हें बाहरी लोग समझ नहीं सकते थे। इस शब्द का वर्तमान अर्थ प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन आरंभ होने के बाद ही निश्चित हुआ, जब प्रोटेस्टेंट कलीसियाओं ने बाइबल के प्रामाणिक संग्रह को उसके वर्तमान स्वरूप तक सीमित कर दिया।


1. मूल अर्थ


(1) शास्त्रीय यूनानी भाषा में


यूनानी विशेषण अपोक्रुपहोस (apokruphos) का वास्तविक अर्थ “छिपा हुआ” या “गुप्त रखा हुआ” है। प्रारंभ में इसका प्रयोग किसी भौतिक वस्तु के लिए किया जाता था (यूरिपिडीज़, हेराक्लीज़ फ्यूरियन्स, 1070)। बाद में इसका अर्थ ऐसी बात से भी होने लगा जो अस्पष्ट, गूढ़ या समझने में कठिन हो (जेनोफोन, मेमोरेबिलिया, 3.5.14)। लेकिन शास्त्रीय यूनानी भाषा में इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं मिलता।


(2) हेलेनिस्टिक यूनानी भाषा में


सेप्टुआजेंट और नए नियम में प्रयुक्त हेलेनिस्टिक यूनानी भाषा में इस शब्द के अर्थ में शास्त्रीय यूनानी भाषा से कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं दिखाई देता।


दानिय्येल 11:43 के सेप्टुआजेंट अनुवाद (अथवा अधिक सही रूप से थियोडोशन के अनुवाद) में यह शब्द सोने और चाँदी के छिपाकर रखे गए भंडारों के लिए “छिपा हुआ” अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। लेकिन उसी पाठ में इस शब्द का एक अन्य अर्थ भी है—ऐसी बातें जो मनुष्य के ज्ञान और समझ से छिपी हुई हों।


दानिय्येल 2:20 (थियोडोशन) में भी यही अर्थ मिलता है। वहाँ अपोक्रुफा अर्थात् छिपी हुई बातें, नबूकदनेस्सर के स्वप्न का अर्थ हैं, जिन्हें दानिय्येल पर प्रकट किया गया था, जबकि वे बाबुल के बुद्धिमानों से छिपी हुई थीं।


यह शब्द सिराख 14:21; 39:3,7; 42:19; 48:25 और 43:32 में भी इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।


(3) नए नियम में


नए नियम में यह शब्द केवल तीन बार आता है—मरकुस 4:22 और उसका समानांतर वचन लूका 8:17, तथा कुलुस्सियों 2:3।


अंतिम संदर्भ में बिशप लाइटफुट का विचार था कि अपोक्रुफोई शब्द (“मसीह में छिपे हुए खजाने”) के द्वारा पौलुस झूठे शिक्षकों के उस दावे की ओर संकेत कर रहे थे जिसमें वे गूढ़ ज्ञान रखने का दावा करते थे। मानो पौलुस कहना चाहते हों कि सच्चा ज्ञान और बुद्धि केवल मसीह में ही मिलती है, न कि इन शिक्षकों की गुप्त पुस्तकों में।


यदि इस विचार को स्वीकार किया जाए, तो इस वचन में अपोक्रुफोस शब्द का “गूढ़” अर्थ में प्रयोग पहली बार दिखाई देता है। लेकिन उपलब्ध प्रमाण इस बात के विरुद्ध हैं कि उस समय इस शब्द का प्रयोग इतने आरंभिक काल में ही इस अर्थ में होने लगा था, जबकि बाद में यही इसका प्रचलित अर्थ बन गया। इसके अतिरिक्त, इस वचन की व्याख्या के लिए भी इस अर्थ को स्वीकार करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि यहाँ किसी प्रकार के लेखों या पुस्तकों का संकेत दिखाई नहीं देता।


आरंभिक कलीसियाई लेखकों के लेखों में अपोक्रुफोस विशेषण का प्रयोग यहूदी और मसीही ऐसे लेखों के लिए होने लगा जिनमें भविष्य आदि के विषय में गुप्त ज्ञान दिया गया था। ऐसा माना जाता था कि इन लेखों को केवल कुछ चुनिंदा शिष्य ही समझ सकते थे, जो इन्हें पढ़ते थे और जिनके लिए इन्हें विशेष रूप से उपलब्ध कराया गया था।


इस श्रेणी के लेखों में विशेष रूप से वे लेख आते हैं जिन्हें “प्रलय-संबंधी साहित्य” (Apocalyptic Literature) कहा जाता है (देखें: प्रलय-संबंधी साहित्य)। इस प्रकार के प्रयोग में अपोक्रुफोस शब्द का अर्थ लगभग यूनानी शब्द एसोटेरिकोस (esoterikos) के समान हो जाता है, जिसका अर्थ है “गूढ़” अथवा “केवल विशेष लोगों के लिए उपलब्ध”।


2. यूनानी दर्शन आदि में “गूढ़” का अर्थ


इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले आरंभिक यूनानी दर्शन में प्रचलित इस विचार का संक्षिप्त विवरण उपयोगी होगा।


प्राचीन यूनान के दार्शनिक बहुत आरंभिक समय से ही उन शिक्षाओं और धार्मिक विधियों के बीच अंतर करते थे जिन्हें उनके सभी शिष्यों को सिखाया जा सकता था और उन शिक्षाओं तथा विधियों के बीच, जिन्हें लाभकारी रूप से केवल चुनिंदा लोगों के समूह को ही बताया जा सकता था। चुनिंदा समूह के इन लोगों को दीक्षित (Initiated) कहा जाता था।


शिक्षाओं और विधियों के इन दोनों वर्गों को क्रमशः “बाहरी” (Exoteric) और “गूढ़” (Esoteric) कहा जाता था। इन दोनों में अधिकतर अंतर धार्मिक विधियों से संबंधित था।


लूसियन (जिनकी मृत्यु 312 ईस्वी में हुई; देखें: विटा ऑक्टोरम, 26) और उनके बाद अनेक अन्य लेखकों ने इस अंतर का श्रेय अरस्तू को दिया। लेकिन आधुनिक विद्वानों की सर्वसम्मति के अनुसार यह श्रेय गलत है, क्योंकि अरस्तू के एक्सोटेरिकोई लोगोई (exoterikoi logoi) का अर्थ लोकप्रिय ग्रंथों से था।


पाइथागोरस के अनुयायी इन दोनों प्रकार की शिक्षाओं और कर्तव्यों को मानते थे और उनका पालन करते थे। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि उन्होंने इसी के अनुरूप दो प्रकार का साहित्य भी तैयार किया था। दुर्भाग्यवश, इस प्रकार के साहित्य के कोई स्पष्ट उदाहरण हमारे पास सुरक्षित नहीं हैं।


यूनानी रहस्य-संप्रदायों—जैसे ऑर्फिक, डायोनिसियाई और एल्यूसिनियन परंपराओं—में हर जगह श्रोताओं और पाठकों के दो वर्गों का संकेत मिलता है। खेद की बात है कि इस विषय से संबंधित अधिक साहित्य सुरक्षित नहीं रह पाया है।


बौद्धों में संघ एक ऐसा सीमित समुदाय था, जिसमें आरंभ में केवल उन भिक्षुओं को प्रवेश दिया जाता था जो अत्यंत कठोर परीक्षा के बाद स्वीकार किए जाते थे। बाद के वर्षों में भिक्षुणियों को भी इसमें प्रवेश की अनुमति दी गई, लेकिन उनके लिए भी सावधानीपूर्वक जाँच आवश्यक थी।


विनय पिटक, अर्थात् “अनुशासन की टोकरी”, में संघ में प्रवेश पाने के नियम और प्रवेश के बाद पालन किए जाने वाले निर्देश दिए गए हैं। लेकिन इस प्रकार के और इससे संबंधित साहित्य को बाहरी लोगों के लिए अनुपयुक्त और समझने में कठिन माना जाता था। इसके अनुवाद के लिए सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट, खंड XI (राइस डेविड्स और ओल्डेनबर्ग) देखें।


III. अपोक्रिफा शब्द का प्रयोग


यह ध्यान रखना आवश्यक है कि “अपोक्रिफा” वास्तव में यूनानी भाषा का नपुंसकलिंग बहुवचन विशेषण है, जिसका शाब्दिक अर्थ “छिपी हुई वस्तुएँ” है। लेकिन लगभग निश्चित रूप से इसके साथ संज्ञा बिब्लिया (biblia) अर्थात् “पुस्तकें” समझी जाती है। इसलिए इस शब्द का वास्तविक अभिप्राय “अपोक्रिफल पुस्तकें” अथवा “लेख” है। इस लेख में “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग इसी अंतिम अर्थ में और “अपोक्रिफल” शब्द का प्रयोग यूनानी अपोक्रुफोस के समान अर्थ में किया जाएगा।


1. आरंभिक मसीही प्रयोग


“प्रलय-संबंधी” साहित्य


आरंभिक मसीही लेखकों ने “अपोक्रिफा” शब्द का तकनीकी रूप से सबसे पहले उन यहूदी और मसीही लेखों के लिए प्रयोग किया जिन्हें सामान्यतः “प्रलय-संबंधी साहित्य” (Apocalyptic Literature) के अंतर्गत रखा जाता है (देखें: प्रलय-संबंधी साहित्य)।


इस अर्थ में यह शब्द शास्त्रीय यूनानी शब्द एसोटेरिका (esoterika) के स्थान पर प्रयोग हुआ और इसका सामान्य अर्थ भी वही था। अर्थात् ये ऐसे लेख थे जो केवल एक विशेष आंतरिक समूह के लिए लिखे गए थे और जिन्हें दूसरे लोग समझने में सक्षम नहीं थे। इन लेखों में भविष्य, परमेश्वर के राज्य की अंतिम विजय आदि के विषय में ऐसी बातें बताई जाती थीं जिन्हें उस समय मानवीय खोज और सामान्य समझ से परे माना जाता था। ऐसा समझा जाता था कि इन बातों को केवल वे ही समझ सकते हैं जिन्हें विशेष रूप से इन रहस्यों में दीक्षित किया गया हो।


इसी अर्थ में ग्रेगरी ऑफ निस्सा (मृत्यु 395 ईस्वी; डी ऑर्डिनेशन, II, 44) और एपिफेनियस (मृत्यु 403 ईस्वी; हेरेसिस, 51.3) ने यूहन्ना के प्रकाशितवाक्य को “अपोक्रिफल” कहा है।


2. पूर्वी कलीसिया


मसीही विश्वास में स्वयं ऐसी किसी शिक्षा की अवधारणा नहीं है जो केवल दीक्षित लोगों के लिए हो, या ऐसे साहित्य की जो केवल कुछ चुनिंदा लोगों के लिए उपलब्ध हो। आरंभिक दिनों में सुसमाचार का प्रचार गरीब और अशिक्षित लोगों तक किया गया था। कलीसियाओं ने भी कुछ अपवादों को छोड़कर, आम लोगों को पवित्र शास्त्र पढ़ने और उसका अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया है।


(1) “गूढ़” साहित्य (क्लेमेण्ट ऑफ अलेक्जेंड्रिया आदि)


पूर्वी कलीसिया में इस धारणा का उदय कैसे हुआ, इसे आसानी से समझा जा सकता है। जब यूनानी दर्शन के अनुयायियों ने मसीही विश्वास स्वीकार किया, तो स्वाभाविक था कि वे नए धर्म को पुराने दर्शन के दृष्टिकोण से देखने लगें।


उनमें से बहुत-से लोगों ने प्रामाणिक पवित्र शास्त्र के लेखों में रहस्यमय अर्थ खोजे और उन अर्थों को विशेष पुस्तकों में प्रस्तुत किया। धीरे-धीरे ये पुस्तकें स्वयं गूढ़ साहित्य बन गईं। प्रलय-संबंधी लेखों की तरह इस गूढ़ साहित्य को भी कई बार बाइबल से अधिक आदर दिया जाने लगा।


इसी प्रकार यहूदियों में भी लिखित व्यवस्था के साथ-साथ एक मौखिक व्यवस्था विकसित हुई। इसमें रब्बियों की शिक्षाएँ शामिल थीं और इसे उन लिखित ग्रंथों से भी अधिक पवित्र और अधिकारपूर्ण माना जाता था, जिनकी व्याख्या करने का यह दावा करती थी।


इसकी तुलना इस तथ्य से की जा सकती है कि अनेक मसीहियों के बीच उनके संप्रदाय का आधिकारिक साहित्य स्वयं बाइबल से भी अधिक प्रभावशाली माना जाता है।


यूनानी मसीहियों के बीच इस आंदोलन को ज्ञानवादी संप्रदायों (Gnostic Sects) और उनके द्वारा उत्पन्न गूढ़ साहित्य से बहुत प्रोत्साहन मिला। ये ज्ञानवादी स्वयं बाबुल और फारस के रहस्यवादी विचारों तथा उनसे संबंधित साहित्य से गहराई से प्रभावित थे। क्लेमेण्ट ऑफ अलेक्जेंड्रिया (मृत्यु 220 ईस्वी) ने पारसी (जरथुस्त्र अथवा मज़्देई) धर्म से संबंधित गुप्त पुस्तकों का स्पष्ट उल्लेख किया है।


पूर्वी और विशेषकर यूनानी मसीही परंपरा में दर्शन को वह स्थान देने की प्रवृत्ति थी, जो नए नियम और पश्चिमी मसीही परंपरा में पुराने नियम को दिया जाता है। ऐसा कहा जाता था कि यीशु के धर्म की तैयारी पुराने नियम के धर्म की अपेक्षा दर्शन के माध्यम से अधिक हुई थी।


यह याद रखना चाहिए कि मार्सियन (दूसरी शताब्दी ईस्वी के अंत में मृत्यु), वेल्स के अठारहवीं शताब्दी के ईश्वरवादी विचारक थॉमस मॉर्गन (मृत्यु 1743) और फ्रेडरिक श्लायरमाखर (मृत्यु 1834) ने भी यही शिक्षा दी थी।


क्लेमेण्ट ऑफ अलेक्जेंड्रिया (जिनका ऊपर उल्लेख किया गया है) ने 4 (2) एस्द्रास (जिसे आगे “एस्द्रास का प्रकाशितवाक्य” कहा जाएगा), मूसा का स्वर्गारोहण आदि को पूरी तरह प्रामाणिक माना। इसके अतिरिक्त, उन्होंने यहूदी, मसीही और यहाँ तक कि गैर-यहूदी धर्मों की गूढ़ पुस्तकों के अधिकार और महत्व का भी समर्थन किया।


लेकिन हमारे वर्तमान विषय के लिए उनका महत्व इस कारण सबसे अधिक है कि संभवतः वे पहले यूनानी लेखक थे जिन्होंने “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग एसोटेरिका अर्थात् गूढ़ पुस्तकों के समान अर्थ में किया। उन्होंने पारसी धर्म की गूढ़ पुस्तकों को अपोक्रिफल कहा था।


हालाँकि, गूढ़ धार्मिक साहित्य की अवधारणा यहूदियों में इससे भी पहले मौजूद थी और मसीहियों ने इसे उन्हीं से ग्रहण किया था। यह बात एस्द्रास के प्रलय-संबंधी लेख (2 अथवा 4 एस्द्रास), अध्याय 14 में स्पष्ट रूप से सिखाई गई है।


इस विवरण के अनुसार, एज्रा ने पाँच लेखकों की सहायता से परमेश्वर की प्रेरणा के अंतर्गत 94 पवित्र पुस्तकें तैयार कीं। ऐसा कहा गया है कि यरूशलेम और मंदिर के नष्ट होने पर मूसा और भविष्यद्वक्ताओं के लेख खो गए थे।


इन 94 पवित्र पुस्तकों में से 24 पुस्तकों को सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किया जाना था, ताकि योग्य और अयोग्य—दोनों प्रकार के लोग उन्हें पढ़ सकें। निस्संदेह ये 24 पुस्तकें इब्रानी पुराने नियम की पुस्तकों का प्रतिनिधित्व करती हैं।


शेष 70 पुस्तकों को केवल “लोगों में से बुद्धिमान व्यक्तियों” के उपयोग के लिए सुरक्षित रखा जाना था। अर्थात् वे गूढ़ प्रकृति की पुस्तकें थीं। यदि इस पुस्तक का यूनानी मूल पाठ सुरक्षित रहता, तो संभव है कि इन 70 पुस्तकों के साथ विशेषण के रूप में “अपोक्रिफा” शब्द मिलता।


हमारे अंग्रेज़ी अनुवाद लैटिन मूल पाठ से किए गए हैं। इसे “एज्रा” अथवा “एस्द्रास का प्रकाशितवाक्य” कहा जाता है। आधुनिक विद्वान इस बात से सहमत हैं कि इस पुस्तक का वर्तमान स्वरूप डोमिशियन के शासनकाल (81–96 ईस्वी) में सामने आया। इससे स्पष्ट होता है कि गूढ़ साहित्य की अवधारणा पहली शताब्दी ईस्वी में यहूदियों के बीच मौजूद थी और संभवतः इससे भी पहले विकसित हो चुकी थी।


इस बात का विशेष महत्व है कि इस्राएल के मूल धर्म में “गूढ़” शब्द के समान किसी इब्रानी शब्द की पहचान कोई नहीं कर पाया है (नीचे देखें)। जब यहूदियों के बीच मौखिक परंपरा का साहित्य विकसित हुआ, तो उस पर “गूढ़” की यूनानी अवधारणा लागू करना स्वाभाविक था। इसका एक कारण यह भी था कि यहूदी समुदायों के अनेक वर्गों में इस प्रकार के साहित्य को स्वयं पुराने नियम के पवित्र शास्त्र से अधिक महत्व दिया जाने लगा था।


(2) “धार्मिक” पुस्तकों के अर्थ में परिवर्तन (ओरिजन आदि)


“अपोक्रिफा” शब्द के इतिहास में अगला परिवर्तन तब आया, जब इसका अर्थ पुराने और नए नियम के पवित्र शास्त्र से कम अधिकार और कम महत्व रखने वाली धार्मिक पुस्तकों के लिए किया जाने लगा।


गैर-प्रामाणिक लेखों के प्रति इस बदले हुए दृष्टिकोण के पीछे दो सिद्धांतों का प्रभाव था:


(1) प्रेरितों के युग के बाद जीवित रहने वाला कोई भी लेखक परमेश्वर से प्रेरित नहीं हो सकता।


(2) किसी लेख को प्रामाणिक तभी माना जा सकता है, जब सामान्य रूप से सभी कलीसियाएँ उसे स्वीकार करें। लैटिन भाषा में इस सिद्धांत को इस प्रकार व्यक्त किया गया: Quod ubique, quod semper, quod ab omnibus—अर्थात् “जो हर जगह, हर समय और सभी के द्वारा स्वीकार किया गया हो।”


ऐसा माना जाने लगा कि दूसरी शताब्दी के अंत तक जिन अनेक धार्मिक लेखों को अपमानजनक अर्थ में “अपोक्रिफल” कहा जाने लगा था, उनमें से अधिकांश की उत्पत्ति ज्ञानवादी जैसे विधर्मी संप्रदायों के बीच हुई थी और उन्हें अधिकांश कलीसियाओं की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं हुई थी।


ओरिजन (मृत्यु 253 ईस्वी) का मानना था कि “अपोक्रिफल” कही जाने वाली पुस्तकों के बीच भेद करना आवश्यक है। इनमें से कुछ पुस्तकों को दृढ़ता से अस्वीकार कर देना चाहिए, क्योंकि वे ऐसी शिक्षाएँ देती हैं जो पवित्र शास्त्र के विरुद्ध हैं।


दूसरी शताब्दी के अंत से “अपोक्रिफा” शब्द का अर्थ धीरे-धीरे ऐसी पुस्तकों से जुड़ने लगा जिन्हें जाली और अविश्वसनीय माना जाता था। विशेष रूप से उन लेखों के लिए इसका प्रयोग होने लगा जिन्हें ऐसे लेखकों के नाम से जोड़ा गया था जिन्होंने वास्तव में उनकी रचना नहीं की थी। इन्हें तथाकथित “छद्म-लेखकत्व वाली पुस्तकें” (Pseudepigraphical Books) कहा जाता है।


क्लेमेण्ट ऑफ अलेक्जेंड्रिया के विपरीत इरेनियस (मृत्यु 202 ईस्वी) ने गूढ़ लेखों को विश्वसनीय मानने अथवा उनका सम्मान करने के किसी भी दावे को अस्वीकार किया। उसने “अपोक्रिफल” के लिए प्रयुक्त यूनानी शब्द का उपयोग यहूदी और मसीही दोनों प्रकार के बाइबल-संग्रहों के लिए किया।


उसके लिए, और बाद में जेरोम (मृत्यु 420 ईस्वी) के लिए भी, “प्रामाणिक” और “अपोक्रिफल” एक-दूसरे के विपरीत अर्थ वाले शब्द थे। टर्टुलियन (मृत्यु 230 ईस्वी) का दृष्टिकोण भी यही था। उसके लिए “अपोक्रिफल” का अर्थ था—गैर-प्रामाणिक। हालाँकि इरेनियस और टर्टुलियन दोनों ने “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग विशेष रूप से प्रलय-संबंधी लेखों के लिए किया था।


नाइसिया की महासभा के समय और उससे भी पहले, मसीही शिक्षकों ने पवित्र पुस्तकों को तीन वर्गों में बाँटा था:


(1) वे पुस्तकें जिन्हें कलीसिया में पढ़ा जा सकता था।


(2) वे पुस्तकें जिन्हें निजी रूप से पढ़ा जा सकता था, लेकिन सार्वजनिक रूप से नहीं।


(3) वे पुस्तकें जिन्हें बिल्कुल भी नहीं पढ़ना था।


यह वर्गीकरण ओरिजन, क्लेमेण्ट ऑफ अलेक्जेंड्रिया, अथानासियुस (मृत्यु 373 ईस्वी) के लेखों और मुराटोरियन खंडों (लगभग 200 ईस्वी) में निहित है।


(3) “जाली” पुस्तकें (अथानासियुस, नाइसिफोरस आदि)


अथानासियुस ने “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग केवल तीसरे वर्ग की पुस्तकों के लिए सीमित कर दिया। इस प्रकार “अपोक्रिफल” विशेषण का अर्थ “जाली” अथवा “असली न होने वाला” हो गया।


कॉन्स्टेंटिनोपल के कुलपति नाइसिफोरस (806–815 ईस्वी) ने अपनी कालक्रम-संबंधी पुस्तक में पवित्र पुस्तकों को इस प्रकार विभाजित किया। जान के अनुसार, यह ग्रंथ मूलतः लगभग 500 ईस्वी का है।


(1) पुराने और नए नियम की प्रामाणिक पुस्तकें।


(2) दोनों नियमों की विवादित पुस्तकें (Antilegomena)।


(3) दोनों नियमों की अपोक्रिफल पुस्तकें।


पुराने नियम के अपोक्रिफा की पुस्तकें इस प्रकार गिनाई गई हैं:


(1) हनोक।


(2) बारह कुलपिताओं की पुस्तक।


(3) यूसुफ की प्रार्थना।


(4) मूसा की वसीयत।


(5) मूसा का स्वर्गारोहण।


(6) अब्राम।


(7) एल्दाद और मोदाद।


(8) भविष्यद्वक्ता एलिय्याह।


(9) भविष्यद्वक्ता सपन्याह।


(10) यूहन्ना के पिता जकर्याह।


(11) बारूक, हबक्कूक, यहेजकेल और दानिय्येल की छद्म-लेखकत्व वाली पुस्तकें।


नए नियम के अपोक्रिफा की पुस्तकें इस प्रकार दी गई हैं:


(1) पौलुस की यात्राओं का वृत्तांत।


(2) पतरस की यात्राओं का वृत्तांत।


(3) यूहन्ना की यात्राओं का वृत्तांत।


(4) थोमा की यात्राओं का वृत्तांत।


(5) थोमा के अनुसार सुसमाचार।


(6) प्रेरितों की शिक्षा (डिडाखे)।


(7) और (8) क्लेमेंट की दो पत्रियाँ।


(9) इग्नाटियुस, पॉलीकार्प और हर्मास की पत्रियाँ।


उपरोक्त सूचियाँ तथाकथित “अथानासियुस की संक्षिप्त सूची” में भी दोहराई गई हैं।


इन तथाकथित अपोक्रिफल पुस्तकों के लेखकों के नाम अज्ञात थे। इन लेखों को सम्मान दिलाने के लिए प्रसिद्ध व्यक्तियों के नाम इनके साथ जोड़ दिए गए। इस कारण विशेषकर पश्चिमी कलीसिया में “अपोक्रिफल” शब्द लगभग “छद्म-लेखकत्व वाली पुस्तक” का पर्याय बन गया।


ऊपर दी गई पुराने नियम की अपोक्रिफा संबंधी सूची में से क्रमांक 1, 2, 4 और 5 की पुस्तकें पूरी अथवा आंशिक रूप से आज भी उपलब्ध हैं। क्रमांक 3, 7, 8 और 9 की पुस्तकें खो चुकी हैं, हालाँकि ओरिजन और अन्य पूर्वी कलीसियाई धर्मपिताओं ने उन्हें प्रामाणिक मानकर उद्धृत किया था। ये सभी प्रलय-संबंधी पुस्तकें हैं, जिन्हें शब्द के आरंभिक अर्थ के अनुसार अपोक्रिफा कहा गया था।


(4) “साठ पुस्तकों की सूची”


सातवीं शताब्दी की एक अज्ञात लेखक द्वारा तैयार की गई “साठ पुस्तकों की सूची” में संभवतः पूर्वी कलीसिया का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। इसमें पवित्र पुस्तकों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया है:


(1) साठ प्रामाणिक पुस्तकें। चूँकि प्रोटेस्टेंट बाइबल के प्रामाणिक संग्रह में केवल 57 पुस्तकें हैं, इसलिए स्पष्ट है कि इस सूची में ऐसी पुस्तकें भी शामिल हैं जिन्हें हमारे प्रामाणिक संग्रह से बाहर रखा गया है।


(2) वे पुस्तकें जिन्हें साठ पुस्तकों की सूची से बाहर रखा गया है, लेकिन जिन्हें अगले वर्ग में उल्लिखित अपोक्रिफल पुस्तकों से अधिक अधिकारपूर्ण माना गया है।


(3) अपोक्रिफल पुस्तकें। इनके नाम इस प्रकार हैं:


(a) आदम।


(b) हनोक।


(c) लेमेक।


(d) बारह कुलपिताओं की पुस्तक।


(e) यूसुफ की प्रार्थना।


(f) एल्दाद और मोदाद।


(g) मूसा की वसीयत।


(h) मूसा का स्वर्गारोहण।


(i) सुलैमान के भजन।


(j) एलिय्याह का प्रकाशितवाक्य।


(k) यशायाह का स्वर्गारोहण।


(l) सपन्याह का प्रकाशितवाक्य (नाइसिफोरस की कालक्रम-संबंधी पुस्तक में पुराने नियम की अपोक्रिफा की सूची के क्रमांक 9 को देखें)।


(m) जकर्याह का प्रकाशितवाक्य।


(n) एस्द्रास का प्रलय-संबंधी लेख।


(o) याकूब का इतिहास।


(p) पतरस का प्रकाशितवाक्य।


(q) प्रेरितों की यात्राएँ और शिक्षा।


(r) बरनबास की पत्रियाँ।


(s) पौलुस के काम।


(t) पौलुस का प्रकाशितवाक्य।


(u) क्लेमेंट की डिडास्कालिया (शिक्षा-संबंधी लेख)।


(v) इग्नाटियुस की डिडास्कालिया।


(w) पॉलीकार्प की डिडास्कालिया।


(x) बरनबास के अनुसार सुसमाचार।


(y) मत्ती के अनुसार सुसमाचार।


इन पुस्तकों में से अधिकांश को “अपोक्रिफल” नाम उनके आरंभिक अर्थ “प्रलय-संबंधी” के अनुसार दिया गया था। लेकिन इस समय तक इस शब्द का अर्थ घटकर ऐसी पुस्तकों तक सीमित हो गया था जिन्हें निजी रूप से पढ़ने के लिए भी उचित नहीं माना जाता था।


फिर भी, यह तथ्य कि इन पुस्तकों का उल्लेख किया गया है, दिखाता है कि इन्हें गैर-यहूदी धार्मिक लेखों और यहाँ तक कि विधर्मी मसीही लेखों से भी अधिक सम्मान दिया जाता था।


आज तक पूर्वी कलीसियाएँ “अपोक्रिफा” के उस अर्थ को स्वीकार नहीं करतीं जो प्रोटेस्टेंट समुदायों में प्रचलित है (ऊपर दी गई परिभाषा देखें)। उनकी बाइबल में पुराने नियम का अपोक्रिफा भी शामिल है और वे उसके तथा बाइबल के अन्य भागों के बीच कोई अंतर नहीं करतीं।


3. पश्चिमी कलीसिया


(1) डिक्रेटम गेलासियाई


पश्चिमी कलीसिया में “अपोक्रिफा” शब्द और उसके संबंधित विशेषण का इतिहास कुछ अलग था। सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि पश्चिमी कलीसिया ने पवित्र पुस्तकों के उस तीन-भाग वाले वर्गीकरण को स्वीकार नहीं किया जो पूर्वी कलीसिया में प्रचलित था।


फिर भी, डिक्रेटम गेलासियाई में (जिसका वर्तमान स्वरूप छठी शताब्दी का है) तीन वर्गों की एक सूची मिलती है। यह सूची लगभग निश्चित रूप से रोम के उस धर्मसभा की है जो रोम के बिशप दमासुस के शासनकाल (366–384 ईस्वी) में 382 ईस्वी में हुई थी।


यह सूची इस प्रकार है:


(1) दोनों नियमों की प्रामाणिक पुस्तकें।


(2) कलीसिया द्वारा स्वीकृत कलीसियाई धर्मपिताओं के लेख।


(3) कलीसिया द्वारा अस्वीकार की गई अपोक्रिफल पुस्तकें।


इसके बाद अनेक अन्य पुस्तकों की सूची दी गई है जिन्हें विधर्मी ठहराकर निंदा की गई थी। इनमें क्लेमेण्ट ऑफ अलेक्जेंड्रिया, टर्टुलियन और यूसेबियुस की रचनाएँ भी शामिल थीं। इन सभी रचनाओं को “अपोक्रिफल” कहकर चिह्नित किया गया था।


दूसरी ओर, चौथी शताब्दी में लिखने वाले ग्रेगरी ऑफ निस्सा और एपिफेनियस ने “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग इसके पुराने अर्थ में किया था, अर्थात् प्रलय-संबंधी अथवा गूढ़ साहित्य के लिए।


(2) “गैर-प्रामाणिक” पुस्तकें


जेरोम (मृत्यु 420 ईस्वी) ने अपनी बाइबल के लैटिन अनुवाद की भूमिका में “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग गैर-प्रामाणिक पुस्तकों के अर्थ में किया। इस भूमिका को प्रोलोगुस गेलाटुस कहा जाता है। इसका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि यह एक बचाव-लेख था और इसकी तुलना ऐसे योद्धा से की गई थी जिसने अपने सिर पर टोप पहन रखा हो।


जेरोम के शब्द थे:


Quidquid extra hos (अर्थात् 22 प्रामाणिक पुस्तकें) inter Apocrypha ponendum.


इसका अर्थ है: “इन पुस्तकों के अतिरिक्त जो कुछ भी है, उसे अपोक्रिफा में रखा जाना चाहिए।”


यहाँ ध्यान देने योग्य है कि यहूदी और कलीसियाई धर्मपिताओं में पुराने नियम की पुस्तकों की संख्या 24 के बजाय 22 मानी जाती थी, क्योंकि रूत और विलापगीत को क्रमशः न्यायियों और यिर्मयाह के साथ जोड़ा जाता था।


इस विषय में जेरोम का अनुसरण रूफिनुस (मृत्यु लगभग 410 ईस्वी) ने किया, जो कभी जेरोम का मित्र और कभी विरोधी रहा था। इससे पहले इरेनियस भी इसी प्रकार का विचार व्यक्त कर चुका था।


हालाँकि पश्चिमी कलीसिया ने जेरोम के सिद्धांत से हटकर दोनों नियमों की विवादित पुस्तकों को प्रामाणिक लेखों में शामिल कर लिया था, फिर भी उस समय पश्चिमी मसीहियों में सामान्य प्रथा यही थी कि “अपोक्रिफल” का अर्थ गैर-प्रामाणिक समझा जाए।


लेकिन ऑगस्टीन (मृत्यु 430 ईस्वी; डी सिविटेटे देई, XV, 23) ने समझाया कि “अपोक्रिफा” शब्द का अर्थ ऐसी पुस्तकों से है जिनकी उत्पत्ति अथवा लेखकत्व अस्पष्ट है। पश्चिमी कलीसिया में यही अर्थ आगे चलकर सबसे अधिक प्रचलित हो गया।


4. धर्म-सुधारक


प्रामाणिक पुस्तकों से अलग करना


पुराने नियम के अंत में पुस्तकों के एक अलग संग्रह के रूप में अपोक्रिफा को रखने की प्रथा के लिए हम धर्म-सुधारकों के ऋणी हैं। सामान्यतः 1827 तक छपने वाली प्रत्येक अंग्रेज़ी बाइबल में पुराने नियम के अंत में ये पुस्तकें शामिल की जाती थीं।


कार्लश्टाट के बोडेनस्टाइन, जिन्हें सामान्यतः कार्लश्टाट कहा जाता है (मृत्यु 1541 ईस्वी), एक आरंभिक धर्म-सुधारक थे। यद्यपि वे लूथर के कट्टर व्यक्तिगत विरोधी थे, फिर भी वे पहले आधुनिक विद्वान थे जिन्होंने “अपोक्रिफा” की स्पष्ट परिभाषा दी। उनके अनुसार, अपोक्रिफा उन लेखों को कहा जाता है जिन्हें प्रामाणिक संग्रह से बाहर रखा गया है, चाहे उन पुस्तकों के वास्तविक लेखक ज्ञात हों या अज्ञात। इस प्रकार उन्होंने जेरोम के दृष्टिकोण को फिर से अपनाया।


प्रोटेस्टेंट समुदायों में “अपोक्रिफल” विशेषण का अर्थ धीरे-धीरे अपमानजनक और नकारात्मक होता चला गया। प्रोटेस्टेंट विश्वास मूलतः एक पुस्तक-केंद्रित विश्वास था। इसलिए प्रोटेस्टेंट यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि जिस पवित्र ग्रंथ पर उनका विश्वास और उनके द्वारा किए गए सुधार आधारित थे, उसमें केवल वही पुस्तकें हों जिन्हें वे अधिकारपूर्ण मानने के सबसे मजबूत दावे रखने वाली समझते थे।


यूनानी (सेप्टुआजेंट) और लैटिन (वुल्गेट) अनुवादों के प्रभाव में पूर्वी और पश्चिमी कलीसियाओं में अपोक्रिफा की पुस्तकें प्रामाणिक संग्रह का अभिन्न भाग थीं। उन्हें पुराने नियम में उन पुस्तकों के बीच रखा जाता था जिनसे उनका विषय-संबंध था।


यहाँ तक कि 1827 तक प्रोटेस्टेंट बाइबलों में भी अपोक्रिफा शामिल था, लेकिन उसे पुराने नियम के अंत में अलग-अलग लेखों के एक संग्रह के रूप में रखा जाता था।


अब तक की चर्चा से स्पष्ट है कि पूर्वी और पश्चिमी कलीसियाओं का दृष्टिकोण आरंभिक समय से ही अपोक्रिफा के प्रति अनुकूल रहा था, फिर भी हमारे वर्तमान अपोक्रिफा को कम या अधिक संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। उसके प्रति सामान्य विरोध के कारण यह संदेह और भी बढ़ा।


मध्य युग में महान विद्वान और धर्म-सुधारक रॉयखलिन (मृत्यु 1532 ईस्वी) के प्रभाव से इब्रानी भाषा का अध्ययन और पुराने नियम को उसकी मूल भाषा में पढ़ने की प्रवृत्ति बढ़ी। इस तथ्य ने कि इब्रानी प्रामाणिक संग्रह में अपोक्रिफा शामिल नहीं था, धर्म-सुधारकों के विचारों को अवश्य प्रभावित किया होगा।


इसके अतिरिक्त, अपोक्रिफा में कुछ ऐसे अंश भी हैं जो प्रोटेस्टेंट सिद्धांतों से मेल नहीं खाते। उदाहरण के लिए, मरे हुओं के लिए प्रार्थना और संतों की मध्यस्थता जैसे सिद्धांत।


आरंभिक मसीही शताब्दियों में यहूदियों के पास वास्तव में दो प्रकार की बाइबलें थीं:


(1) इब्रानी बाइबल, जिसमें अपोक्रिफा शामिल नहीं था और जिसका उपयोग फिलिस्तीन तथा बाबुल में होता था।


(2) यूनानी अनुवाद अर्थात् सेप्टुआजेंट, जिसका उपयोग हर जगह यूनानी भाषा बोलने वाले यहूदी करते थे।


प्रारंभिक समय में ही मसीहियों द्वारा अपने विरुद्ध इस यूनानी अनुवाद का उपयोग किए जाने के कारण यहूदियों ने इसे अस्वीकार कर दिया और इब्रानी प्रामाणिक संग्रह को अपनी बाइबल के रूप में स्वीकार किया। इस प्रकार उन्होंने अपोक्रिफा की पुस्तकों को अपने प्रामाणिक लेखों की सूची से बाहर कर दिया।


इसके विपरीत, मसीही कलीसियाओं ने कुछ अलग-अलग विरोधों के बावजूद यूनानी पुराने नियम के प्रामाणिक संग्रह को अपना मानक बनाए रखा। वुल्गेट भी लगभग पूरी तरह इसी से सहमत है।


यह ज्ञात है कि धर्म-सुधारक बाइबल के सावधानीपूर्वक अध्ययनकर्ता थे। पुराने नियम के विषयों में वे यहूदी विद्वानों के शिष्य थे, क्योंकि इब्रानी भाषा के अन्य योग्य शिक्षक उपलब्ध नहीं थे। इसलिए यह अपेक्षा की जा सकती थी कि धर्म-सुधारकों का पुराना नियम संबंधी प्रामाणिक संग्रह यूनानी और लैटिन मसीहियों के संग्रह के बजाय यहूदियों के संग्रह के समान होगा।


हालाँकि राइल (कैनन ऑफ द ओल्ड टेस्टामेंट, पृष्ठ 156) ने इस विषय पर संदेह व्यक्त किया है, फिर भी सभी प्रमाण यही दिखाते हैं कि सेप्टुआजेंट और इसलिए अन्य प्रमुख यूनानी अनुवादों में भी आरंभ से ही अपोक्रिफा शामिल था।


लेकिन प्रश्न यह है कि यूनानी पुराना नियम इब्रानी पुराने नियम से अधिक विस्तृत क्यों है?


71 ईस्वी में यरूशलेम के अंतिम विनाश तक मंदिर, उसकी याजक-व्यवस्था और धार्मिक विधियाँ यहूदी राष्ट्र के धार्मिक विचार और जीवन का केंद्र थीं। लेकिन पवित्र स्थान के नष्ट होने और उसके अधिकारियों के बिखर जाने के बाद राष्ट्र को एक नए ऐसे आधार की आवश्यकता हुई जो लोगों को एकता में बाँध सके और उनका मार्गदर्शन कर सके। यह आधार पवित्र लेखों के उस संग्रह में पाया गया जिसे आज हम पुराने नियम के नाम से जानते हैं।


90 ईस्वी में जाफा के निकट यामनिया में आयोजित एक राष्ट्रीय सभा के द्वारा पुराने नियम का प्रामाणिक संग्रह व्यावहारिक रूप से बंद कर दिया गया, हालाँकि अंतिम रूप से नहीं। उस समय से यह कहा जा सकता है कि पुराने नियम की सीमाएँ निश्चित कर दी गईं और उसमें केवल वही लेख शामिल किए गए जो इब्रानी भाषा में लिखे गए थे। इनमें सबसे बाद के लेख भी लगभग 100 ईसा पूर्व तक के थे।


अब बिखरे हुए यहूदी समुदायों के लोग यूनानी भाषा बोलते और लिखते थे। वे अपने देश में रहने वाले उन साथी यहूदियों के बहुत समय बाद तक भी विचार और लेखन करते रहे, जिन्होंने नए मौलिक साहित्य की रचना करना बंद कर दिया था। बिखरे हुए यहूदी समुदायों द्वारा जो साहित्य तैयार किया गया, वह मुख्यतः पहले से लिखे गए लेखों की व्याख्या और व्यावहारिक विषयों से संबंधित था।


यूनानी बाइबल अर्थात् सेप्टुआजेंट मिस्र और अन्य यूनानी भाषा बोलने वाले देशों में रहने वाले यहूदियों की बाइबल थी।


जॉन वाइक्लिफ (मृत्यु 1384 ईस्वी) ने अपोक्रिफा की पुस्तकों को पुराने नियम के अंत में रखा। यही तरीका लूथर ने अपनी प्रसिद्ध जर्मन बाइबल (1546) में और माइल्स कवरडेल (मृत्यु 1568 ईस्वी) ने अपने अंग्रेज़ी अनुवाद में अपनाया।


5. “अपोक्रिफा” के लिए इब्रानी शब्द


क्या यह पूरी तरह निश्चित है कि इब्रानी भाषा में ऐसा कोई शब्द या अभिव्यक्ति नहीं है जो मसीही लेखकों द्वारा आरंभ में “अपोक्रिफा” शब्द के लिए प्रयुक्त अर्थ—अर्थात् “गूढ़”—के बिल्कुल समान हो?


पुराने नियम और तल्मूद के संबंध में इसका उत्तर निश्चित रूप से “नहीं” है। लेकिन मध्य युग में कब्बाला (qabbalah) शब्द, जिसका शाब्दिक अर्थ “परंपरा” है, एक ऐसा अर्थ ग्रहण करने लगा जो इस विचार से निकटता रखता है। इसकी तुलना हमारे शब्द “कब्बालिस्टिक” से की जा सकती है।


(1) क्या ऐसे शब्द वास्तव में मौजूद हैं?


क्या इब्रानी भाषा में ऐसा कोई शब्द या अभिव्यक्ति है जिसका अर्थ “गैर-प्रामाणिक” हो, अर्थात् वह अर्थ जो बाद में “अपोक्रिफा” शब्द से जुड़ गया?


इस प्रश्न का उत्तर उतनी निश्चितता से नहीं दिया जा सकता। वास्तव में, इस विषय पर अलग-अलग विचार व्यक्त किए गए हैं।


(2) जान, श्यूरर, पोर्टर आदि के विचार (गनाज़, गेनुज़ीम)


जान (Gesch. des neutest. Kanons, I, i, 123 आगे); श्यूरर (RE3, I, 623); पोर्टर (HDB, I) और अन्य विद्वानों का मानना है कि यूनानी शब्द “अपोक्रिफा (बिब्लिया)” इब्रानी अभिव्यक्ति सेफारिम गेनुज़ीम (Cepharim genuzim) का अनुवाद है। इसका शाब्दिक अर्थ है “सुरक्षित रखी गई पुस्तकें” अथवा “भंडार में रखी गई पुस्तकें”।


यदि यह दृष्टिकोण सही है, तो इसका अर्थ होगा कि प्रामाणिक और गैर-प्रामाणिक पुस्तकों के बीच अंतर करने की परंपरा यहूदियों के बीच ही उत्पन्न हुई थी। इस स्थिति में कलीसियाई धर्मपिताओं ने “अपोक्रिफा” शब्द का प्रयोग करते समय केवल यहूदियों की परंपरा का अनुसरण किया और इब्रानी शब्द के स्थान पर यूनानी शब्द का उपयोग किया।


लेकिन इस दृष्टिकोण को अस्वीकार करने के निर्णायक कारण मौजूद हैं।


(3) अस्वीकार करने के कारण


(a) जिस क्रिया गनाज़ (ganaz) से ऊपर दिए गए वाक्यांश का निष्क्रिय कृदंत बना है, उसका अर्थ है “सुरक्षित रख देना” अथवा “दृष्टि से दूर कर देना”। इसका प्रयोग उन वस्तुओं के लिए होता है जिन्हें स्वयं पवित्र या मूल्यवान माना जाता है। इस क्रिया का अर्थ कभी भी किसी पुस्तक को प्रामाणिक संग्रह से बाहर करना नहीं होता।


(b) जब इस शब्द का प्रयोग पवित्र पुस्तकों के संदर्भ में किया जाता है, तो यह केवल उन पुस्तकों के लिए होता है जिन्हें प्रामाणिक माना गया है।


उदाहरण के लिए, जब पंचग्रंथ अथवा इब्रानी बाइबल के अन्य भागों की प्रतियाँ पुरानी हो जाती थीं और लंबे समय तक उपयोग किए जाने के कारण घर या आराधनालय में पढ़ने योग्य नहीं रहती थीं, तब उन्हें जमीन में “दफन” कर दिया जाता था। ऐसा इसलिए किया जाता था क्योंकि वे इतनी पवित्र मानी जाती थीं कि उन्हें जलाना या काटकर नष्ट करना उचित नहीं समझा जाता था।


ऐसी पुस्तकों को दफन करने के लिए जिस क्रिया का प्रयोग होता था, वह गनाज़ थी। लेकिन इस प्रकार दफन की गई पुस्तकें बिना किसी अपवाद के प्रामाणिक पुस्तकें ही थीं।


(c) जिस इब्रानी वाक्यांश की यहाँ चर्चा की जा रही है, वह न तो बेबीलोनियन तल्मूद में और न ही यरूशलेम तल्मूद में एक बार भी मिलता है। इसका उल्लेख केवल बहुत बाद के रब्बियों के लेखों में मिलता है। इसलिए यूनानी शब्द “अपोक्रिफा” उस इब्रानी अभिव्यक्ति का अनुवाद नहीं हो सकता।


प्रामाणिक संग्रह से स्पष्ट रूप से बाहर रखी गई पुस्तकों के लिए इब्रानी शब्द सेफारिम खित्सोनिम (Cepharim chitsonim) है, जिसका अर्थ है “बाहरी पुस्तकें” अथवा “बाहरी और अतिरिक्त पुस्तकें”।


मिश्ना—जो गमारा के साथ मिलकर उस साहित्य का निर्माण करती है जिसे हम तल्मूद कहते हैं—अर्थात् मौखिक व्यवस्था और उसमें किए गए परिवर्धनों को भी इसी प्रकार दो भागों में बाँटा जाने लगा:


(1) मूल मिश्ना।


(2) बाहरी मिश्ना (खित्सोनाह); अरामी भाषा में इसे बराइथा (Baraiytha) कहा जाता है।


6. सारांश


अब तक कही गई बातों का सारांश इस प्रकार है:


(1) प्रोटेस्टेंट कलीसियाओं में “अपोक्रिफा” शब्द उन पुस्तकों के लिए प्रयोग किया जाता है जो सेप्टुआजेंट और वुल्गेट में शामिल हैं, लेकिन इब्रानी बाइबल में नहीं हैं। इस शब्द का यह सीमित अर्थ धर्म-सुधार आंदोलन के आरंभ से पहले नहीं मिलता।


(2) शास्त्रीय और हेलेनिस्टिक यूनानी भाषा में विशेषण अपोक्रुफोस का अर्थ था “छिपा हुआ”—जब इसका प्रयोग दिखाई देने वाली वस्तुओं के लिए होता था; अथवा “अस्पष्ट” और “समझने में कठिन”—जब इसका प्रयोग कुछ प्रकार के ज्ञान के लिए किया जाता था।


(3) आरंभिक कलीसियाई यूनानी लेखों में यह विशेषण शास्त्रीय यूनानी शब्द एसोटेरिकोस के समान अर्थ में प्रयोग होने लगा, जिसका अर्थ “गूढ़” है।


(4) बाद के कलीसियाई यूनानी लेखों (जैसे इरेनियस आदि) और जेरोम से आरंभ होने वाले लैटिन लेखों में यूनानी अपोक्रुफोस का अर्थ “गैर-प्रामाणिक” हो गया। इससे यह भी संकेत मिलता था कि इन पुस्तकों की विषय-वस्तु प्रामाणिक संग्रह की पुस्तकों से कम स्तर की है।


(5) प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधारकों के समय “अपोक्रिफा” शब्द—जिसमें “अपोक्रिफल पुस्तकें” का अर्थ निहित था—उस संग्रह के लिए प्रयुक्त होने लगा जिसे आज “पुराने नियम का अपोक्रिफा” कहा जाता है।


लेकिन यह प्रयोग केवल प्रोटेस्टेंट समुदायों तक सीमित है। पूर्वी कलीसिया और पश्चिमी कलीसिया की रोमन शाखा में पुराने नियम का अपोक्रिफा भी प्रामाणिक संग्रह का उतना ही अभिन्न भाग है जितना उत्पत्ति, राजाओं की पुस्तकें, भजन संहिता अथवा यशायाह।


(6) इब्रानी भाषा में अपोक्रुफोस के समान कोई शब्द नहीं है, चाहे उसका अर्थ “गूढ़” हो या “गैर-प्रामाणिक”।


IV. अपोक्रिफा की विषय-वस्तु


1. पुस्तकों की सूची


अंग्रेज़ी अनुवादों—किंग जेम्स संस्करण और संशोधित संस्करण (ब्रिटिश तथा अमेरिकी)—में अपोक्रिफा की पुस्तकें जिस क्रम में आती हैं, उनकी सूची इस प्रकार है:


(1) 1 एस्द्रास।


(2) 2 एस्द्रास (जिसे आगे “एस्द्रास का प्रलय-संबंधी लेख” कहा जाएगा)।


(3) टोबीत।


(4) यहूदित।


(5) एस्तेर की अतिरिक्त सामग्री।


(6) सुलैमान का ज्ञान।


(7) एक्लेसियास्टिकस (जिसे आगे “सिराख” कहा जाएगा)।


(8) बारूक, यिर्मयाह की पत्री सहित।


(9) तीन पवित्र बालकों का गीत।


(10) सुसन्ना का इतिहास।


(11) बेल और अजगर।


(12) मनश्शे की प्रार्थना।


(13) 1 मकाबियों।


(14) 2 मकाबियों।


ऊपर दी गई सूची में क्रमांक 5, अर्थात् “एस्तेर की अतिरिक्त सामग्री”, को इस प्रकार समझा जा सकता है: इसमें एस्तेर की पुस्तक के अधिकांश अतिरिक्त अंश शामिल हैं। इसके 270 पदों में से 107 पद ऐसे हैं जो सेप्टुआजेंट की सबसे अच्छी पांडुलिपियों और वुल्गेट में इब्रानी बाइबल के मूल पाठ के अतिरिक्त मिलते हैं।


सेप्टुआजेंट में ये अतिरिक्त अंश पूरी पुस्तक में अलग-अलग स्थानों पर पाए जाते हैं और वहाँ दिए गए संदर्भ में उनका अर्थ समझ में आता है। लेकिन जब अंग्रेज़ी अनुवादों के अपोक्रिफा संग्रह में उन्हें एक साथ रख दिया जाता है, तो उनका अर्थ समझना कठिन हो जाता है। जेरोम के लैटिन अनुवाद और वुल्गेट में भी कुछ हद तक यही स्थिति है (देखें: द सेंचुरी बाइबल, एज्रा, नहेमायाह और एस्तेर, पृष्ठ 294 और आगे)।


ऊपर दी गई सूची के क्रमांक 9 से 11 तक की पुस्तकें यूनानी सेप्टुआजेंट और वुल्गेट में दानिय्येल की पुस्तक के साथ जोड़े गए अतिरिक्त अंश हैं। ये अंश मसोराई पाठ में नहीं मिलते। इसलिए इन्हें “दानिय्येल की अतिरिक्त सामग्री” कहना उचित होगा।


अपोक्रिफा के लेखों को एक अलग संग्रह के रूप में एकत्र करने का काम काफी हद तक जेरोम के कारण हुआ। उसने अनेक अपोक्रिफल अतिरिक्त अंशों को उनके मूल संदर्भ से अलग कर दिया, क्योंकि उसे उनकी प्रामाणिकता पर संदेह था। उसके अनुवाद का वुल्गेट पर प्रभाव पड़ा, क्योंकि वुल्गेट ने जेरोम के अनुवाद का निकटता से अनुसरण किया।


हालाँकि सामान्य रूप से यह कहना सही है कि अपोक्रिफा यूनानी (सेप्टुआजेंट) और लैटिन (जेरोम तथा वुल्गेट) बाइबलों में इब्रानी बाइबल (मसोराई पाठ) से अतिरिक्त सामग्री है, फिर भी इस कथन में कुछ स्पष्टीकरण आवश्यक है।


2 (4) एस्द्रास अर्थात् एस्द्रास का प्रलय-संबंधी लेख सेप्टुआजेंट, जेरोम के अनुवाद और लूथर की बाइबल में नहीं मिलता। लेकिन यह वुल्गेट तथा अंग्रेज़ी और अन्य आधुनिक अपोक्रिफा अनुवादों में शामिल है।


दूसरी ओर, 3 और 4 मकाबियों की पुस्तकें सेप्टुआजेंट की सबसे अच्छी पांडुलिपियों में मिलती हैं, लेकिन जेरोम के अनुवाद का अनुसरण करने वाले वुल्गेट ने दोनों को अस्वीकार कर दिया। आधुनिक अंग्रेज़ी और अन्य अपोक्रिफा अनुवाद भी इन्हें अस्वीकार करते हैं।


इसके अतिरिक्त, यह ध्यान देने योग्य है कि वुल्गेट के मूल संग्रह में मनश्शे की प्रार्थना, 1 (3) एस्द्रास और एस्द्रास का प्रलय-संबंधी लेख अपोक्रिफल पुस्तकों के रूप में नए नियम के अंत में जोड़े गए हैं।


2. पुस्तकों का वर्गीकरण


अपोक्रिफा की मूल पुस्तकों को निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जा सकता है:


(1) ऐतिहासिक पुस्तकें


(a) 1 और 2 (अर्थात् 3) एस्द्रास।


(b) 1 और 2 मकाबियों।


(c) दानिय्येल की अतिरिक्त सामग्री (ऊपर दी गई सूची के क्रमांक 9–11)।


(d) एस्तेर की अतिरिक्त सामग्री।


(e) यिर्मयाह की पत्री (जिसे सामान्यतः बारूक की पुस्तक के साथ जोड़ा जाता है)।


(f) मनश्शे की प्रार्थना।


(2) किंवदंती-आधारित पुस्तकें


(a) बारूक की पुस्तक (कभी इसे भविष्यद्वाणी संबंधी पुस्तकों में और कभी प्रलय-संबंधी पुस्तकों में रखा जाता है)।


(b) टोबीत।


(c) यहूदित।


(3) प्रलय-संबंधी पुस्तक


एस्द्रास का प्रलय-संबंधी लेख अथवा 2 (4) एस्द्रास।


(4) शिक्षाप्रद पुस्तकें


(a) सुलैमान का ज्ञान।


(b) सिराख (एक्लेसियास्टिकस)।


प्रलय-संबंधी और अपोक्रिफल लेखों के हमारे समय के सबसे बड़े विद्वान आर. एच. चार्ल्स ने इनमें से निम्नलिखित पुस्तकों को “हेलेनिस्टिक यहूदी साहित्य” शीर्षक के अंतर्गत रखा है। शेष पुस्तकें “फिलिस्तीनी यहूदी साहित्य” शीर्षक के अंतर्गत आती हैं (एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, 11वाँ संस्करण, खंड II, पृष्ठ 177)।


(1) दानिय्येल और एस्तेर की अतिरिक्त सामग्री।


(2) यिर्मयाह की पत्री।


(3) 2 मकाबियों।


(4) सुलैमान का ज्ञान।


V. अपोक्रिफा की मूल भाषाएँ


अपोक्रिफा का अधिकांश भाग मूल रूप से यूनानी भाषा में लिखा गया था और आरंभ में केवल उसी भाषा में उपलब्ध था।


हालाँकि, निम्नलिखित पुस्तकें इब्रानी भाषा में लिखी गई थीं:


टोबीत, यहूदित, सिराख, बारूक (जिसका कुछ भाग संभवतः यूनानी भाषा में लिखा गया था) और 1 मकाबियों।


इन पुस्तकों के संबंध में कुछ विद्वान यह मानना पसंद करते हैं कि ऊपर बताई गई पुस्तकों के कम-से-कम कुछ भागों की मूल भाषा इब्रानी के बजाय अरामी थी। विस्तृत जानकारी के लिए इन पुस्तकों पर दिए गए अलग-अलग लेख देखें।


VI. अपोक्रिफल लेखों की रचना-तिथि


अपोक्रिफा की अलग-अलग पुस्तकों की रचना-तिथि पर चर्चा उन संबंधित लेखों में की जाएगी जो प्रत्येक पुस्तक के विषय में लिखे गए हैं।


फिर भी, उन समय-सीमाओं के बारे में एक सामान्य कथन निश्चित रूप से किया जा सकता है जिनके बीच ये सभी पुस्तकें पूरी हुईं।


सबसे पुरानी अपोक्रिफल पुस्तक सिराख है। इसका मूल इब्रानी रूप 190–170 ईसा पूर्व के बीच का है। इसके यूनानी रूप की रचना-तिथि के संबंध में अधिकांश श्रेष्ठ आधुनिक विद्वान 130–120 ईसा पूर्व के बीच की अवधि स्वीकार करते हैं।


इन पुस्तकों में से किसी की भी रचना 100 ईस्वी के बाद की नहीं मानी जा सकती, हालाँकि कुछ पुस्तकें—जैसे 2 एस्द्रास—लगभग इसी समय तक की हो सकती हैं।


औसत से अधिक निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि अपोक्रिफा की सभी पुस्तकों की रचना लगभग 200 ईसा पूर्व से 100 ईस्वी के बीच हुई।


इसलिए यह मान लेना गलत है कि अपोक्रिफा के सभी भाग पुराने नियम के अंतिम भागों से भी बाद के समय में लिखे गए थे। दानिय्येल की प्रामाणिक पुस्तक और भजन संहिता के अनेक भजन सिराख और 1 एस्द्रास से बाद के समय के हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसे ठोस कारण भी हैं जिनके आधार पर प्रामाणिक एस्तेर की पुस्तक की रचना-तिथि ऊपर बताई गई सभी पुस्तकों और संभवतः यहूदित की पुस्तक से भी बाद की मानी जा सकती है (फिर भी देखें: दानिय्येल; एस्तेर)।


लेकिन यह निश्चित है कि अपोक्रिफा का बहुत बड़ा भाग पुराने नियम की पुस्तकों से बाद के समय में लिखा गया था। इसलिए यह विभिन्न कालखंडों में यहूदियों की स्थिति और उनके बौद्धिक तथा धार्मिक जीवन के स्वरूप को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। बाद के वर्षों में इस साहित्य का बहुत उपयोग किया गया है।


साहित्य-सूची


अपोक्रिफा का यूनानी पाठ सेप्टुआजेंट के विभिन्न संस्करणों में दिया गया है। इसका अपवाद एस्द्रास का प्रलय-संबंधी लेख है, जो यूनानी भाषा में उपलब्ध नहीं है।


सेप्टुआजेंट के श्रेष्ठ संस्करणों में टिशेंडोर्फ का संस्करण (जिसका संशोधन ई. नेस्टले ने 1887 में किया) और स्वेट का संस्करण (1895–1899 तथा उसके बाद के संस्करण) शामिल हैं।


अपोक्रिफा के आलोचनात्मक संस्करण ए. फैब्रिसियुस (हैम्बर्ग, 1722–1723), अपेल (वही स्थान, 1804) और ओ. टी. फ्रिट्शे (लाइपज़िग, 1871) ने प्रकाशित किए हैं। फ्रिट्शे का संस्करण अत्यंत मूल्यवान है। इसमें एस्द्रास के प्रलय-संबंधी लेख का लैटिन अनुवाद भी शामिल है, हालाँकि उसमें खोया हुआ अंश शामिल नहीं है।


इसके कई आधुनिक अनुवाद उपलब्ध हैं। इनमें सबसे श्रेष्ठ जर्मन अनुवाद है, जिसे ई. काउट्श ने संपादित किया था। इसमें सामान्य और विशेष भूमिकाएँ तथा श्रेष्ठ जर्मन विद्वानों की मूल्यवान टिप्पणियाँ शामिल हैं।


अंग्रेज़ी भाषा में संशोधित संस्करण (ब्रिटिश और अमेरिकी) के अतिरिक्त सी. जे. बॉल द्वारा संपादित उपयोगी वैरियोरम संस्करण भी उपलब्ध है।


आर. एच. चार्ल्स द्वारा संपादित अपोक्रिफा का एक अंग्रेज़ी आलोचनात्मक संस्करण, जिसमें परिचयात्मक टिप्पणियाँ भी हैं, उस समय ऑक्सफोर्ड में मुद्रणाधीन था और अत्यंत मूल्यवान सिद्ध होने वाला था।


सबसे अच्छी टीका ओ. एफ. फ्रिट्शे और सी. एल. डब्ल्यू. ग्रिम की कुर्ज़गेफ. एक्सेगेटिशेस हैंडबुच (1851–1860) है। इसके अतिरिक्त, लैंगे की टीका-श्रृंखला में बिसेल की टीका और स्पीकर्स बाइबल सीरीज़ में वेइस द्वारा संपादित टीका भी सराहनीय हैं।


भूमिका-संबंधी सामग्री विभिन्न बाइबल शब्दकोशों में इस शब्द के अंतर्गत मिलेगी। विशेष रूप से एच. ई. राइल की डिक्शनरी ऑफ द बाइबल (1893), श्यूरर की RE3 और यूनानी भाषा में पुराने नियम के विषय में एच. बी. स्वेट की मूल्यवान पुस्तक इंट्रोडक्शन टू द ओल्ड टेस्टामेंट इन ग्रीक (1900) देखें।


इसके अतिरिक्त, हेस्टिंग्स का डिक्शनरी ऑफ द बाइबल (पाँच खंड; सी. एफ. पोर्टर) और आर. एच. चार्ल्स का एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, 11वाँ संस्करण भी देखें।


कोनिग, बुड्डे (जिसमें अपोक्रिफा वाले भाग को ए. बेर्थोलेट ने लिखा है) और श्यूरर की गेशिख्टे, खंड III, 1898 (अंग्रेज़ी अनुवाद, खंड II, भाग iii) में भी परिचयात्मक सामग्री उपलब्ध है। इनमें साहित्य-संबंधी अनेक संदर्भ दिए गए हैं।


अपोक्रिफा की अलग-अलग पुस्तकों पर लिखे गए शोध-ग्रंथों अथवा विशेष विषयों पर चर्चा करने वाली पुस्तकों के लिए संबंधित पुस्तकों के अलग-अलग लेख देखें।


थॉमस विटन डेविस (Thomas Witton Davies)


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